श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  2.5.112 
সর্ব-সৃষ্টি-তিরোভাব যে সমযে হয
তখন ও অনন্ত-রূপ ’সত্য’ বেদে কয
सर्व-सृष्टि-तिरोभाव ये समये हय
तखन ओ अनन्त-रूप ’सत्य’ वेदे कय
 
 
अनुवाद
वेदों में कहा गया है कि अंतिम प्रलय के समय भगवान अपने अनंत रूप में अप्रभावित रहते हैं।
 
It is said in the Vedas that at the time of final dissolution the Lord remains unaffected in His infinite form.
तात्पर्य
वैदिक साहित्यों में अनंत को असीमित, स्वतंत्र नियंत्रक के रूप में वर्णित किया गया है जो सभी ब्रह्मांडों में प्रवेश करता है और जो इस दृश्यमान जगत के निर्माण, रखरखाव और विनाश का एकमात्र कारण है; फिर भी, इन गतिविधियों को संचालित करने के लिए वह उचित समय पर भौतिक सृष्टि के भीतर अपना अनंत रूप प्रकट करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)