श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.5.111 
যদ্যপিহ অনন্ত ঈশ্বর নিরাশ্রয
সৃষ্টি-স্থিতি-প্রলযের হেতু জগন্-ময
यद्यपिह अनन्त ईश्वर निराश्रय
सृष्टि-स्थिति-प्रलयेर हेतु जगन्-मय
 
 
अनुवाद
वह असीमित, स्वतंत्र नियंत्रक तथा विश्व की सृष्टि, पालन और संहार का कारण है।
 
He is the unlimited, independent controller and the cause of creation, sustenance and destruction of the universe.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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