श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  2.5.105 
ছয-ভুজ-দৃষ্টি তানে কোন্ অদ্ভুত
অবতার-অনুরূপ এ সব কৌতুক
छय-भुज-दृष्टि ताने कोन् अद्भुत
अवतार-अनुरूप ए सब कौतुक
 
 
अनुवाद
भगवान के छह भुजाओं वाले रूप का प्रकटीकरण आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि ऐसे सभी प्रकटीकरण उनके विभिन्न अवतारों की लीला मात्र हैं।
 
The manifestation of the six-armed form of the Lord is not surprising, because all such manifestations are merely the pastimes of His various incarnations.
तात्पर्य
श्री नित्यानंद प्रभु द्वारा गौरासुंदर के छह हाथों वाले रूप के दर्शन बिलकुल भी आश्चर्यजनक नहीं है। गौरा के लीलाओं की आवश्यकता के अनुसार ऐसे उल्लेखनीय रूप प्रकट होते हैं। श्री गौरासुंदर सभी अवतारों का स्रोत है। इसलिए उनके लिए अपने विस्तार के हल और गदा और विष्णु रूप के चार हथियारों को धारण करना बिलकुल भी आश्चर्यजनक नहीं है। श्री नित्यानंद प्रभु अपने स्वयं के हल और गदा और भगवान के हाथों में शंख और चक्र जैसे चार हथियार देखने में सक्षम हैं, जो सभी विष्णु-तत्वों की उत्पत्ति हैं। यही कारण है कि श्रील कावीराज गोस्वामी ने स्वीकार किया है कि तत्व, या सत्य, जैसे स्वयं-रूप, प्रकाश और अवतार, उनमें शामिल हैं जिन्हें कृष्ण चैतन्य नाम से जाना जाता है। प्रकाश, या विस्तार, अवतार, या अवतार, शक्तियाँ, या ऊर्जाएँ, और भक्त, या भक्त, स्वयं-रूप, या परमेश्वर के मूल व्यक्तित्व से अलग नहीं हैं। कृष्ण चैतन्य के भीतर वे सभी व्यक्तिगत रूप से एक साथ अलग-अलग विशेषताओं के साथ शामिल हैं। अपने गौरा-लीला में इस अचिंत्य-भेदाभेद दर्शन को प्रदर्शित करने के लिए, भगवान ने श्री नित्यानंद प्रभु को अपना छह हाथों वाला रूप दिखाया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)