श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 4: नित्यानंद की महिमा का प्रकटन  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.4.66 
সঙ্গী, সখা, ভাই, ছত্র, শযন, বাহন
নিত্যানন্দ বহি অন্য নহে কোন জন
सङ्गी, सखा, भाइ, छत्र, शयन, वाहन
नित्यानन्द बहि अन्य नहे कोन जन
 
 
अनुवाद
केवल नित्यानन्द ही भगवान की सेवा उनके साथी, मित्र, भाई, छत्र, शय्या और वाहक के रूप में करते हैं।
 
Only Nityananda serves the Lord as His companion, friend, brother, umbrella, bed and carrier.
तात्पर्य
नित्यानंद प्रभु के सिवा कोई भी गौरासुंदर का साथी, मित्र, भाई, धूप से बचानेवाली छतरी, विश्राम करने के लिए बिस्तर और घूमने-फिरने के लिए सवारी नहीं बन सकता। केवल नित्यानंद ही गौरासुंदर की पूर्ण रूप से सेवा करने के योग्य हैं। चैतन्य चरितामृत (आदि ५.१२३-१२४) में कहा गया है: "वह भगवान कृष्ण की सभी निम्नलिखित रूपों में सेवा करते हैं: छतरी, चप्पल, बिस्तर, तकिया, वस्त्र, आराम कुर्सी, निवास, पवित्र धागा और सिंहासन वह इसलिए भगवान शेष कहलाते हैं, क्योंकि उन्होंने कृष्ण की सेवा का परम लक्ष्य हासिल किया है। वह कृष्ण की सेवा के लिए कई रूप लेते हैं, और इस प्रकार वह भगवान की सेवा करते हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)