श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 4: नित्यानंद की महिमा का प्रकटन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.4.34 
বিশ্বম্ভর বলে,—“শুভ দিবস আমার
দেখিলাঙ ভক্তি-যোগ—চারি-বেদ-সার
विश्वम्भर बले,—“शुभ दिवस आमार
देखिलाङ भक्ति-योग—चारि-वेद-सार
 
 
अनुवाद
विश्वम्भर ने कहा, "आज का दिन मेरे लिए शुभ है, क्योंकि मैंने भक्ति देखी है, जो चारों वेदों का सार है।
 
Vishvambhara said, “Today is an auspicious day for me, because I have seen devotion, which is the essence of all the four Vedas.
तात्पर्य
केवल भक्ति सेवा ही चारों वेदों का उद्देश्य और सार है। वैदिक साहित्य ने एकमात्र "सार" के रूप में भक्ति सेवा की पुष्टि की है। जब जीव का पूर्ण ज्ञान जागृत हो जाता है, तो भक्ति सेवा, जो उसकी शाश्वत प्रवृत्ति है, जागृत होती है। एक हृदय जो सेवा भाव से भरा होता है वह परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करने के योग्य है और ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह प्रभु की सेवा में स्थिर हो जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)