श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 4: नित्यानंद की महिमा का प्रकटन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.4.32 
নিত্যানন্দ গৌরচন্দ্র দোঙ্হে দোঙ্হা দেখি’
কেহ কিছু নাহি বলে, ঝরে মাত্র আঙ্খি
नित्यानन्द गौरचन्द्र दोङ्हे दोङ्हा देखि’
केह किछु नाहि बले, झरे मात्र आङ्खि
 
 
अनुवाद
नित्यानंद और गौरचन्द्र एक दूसरे को देखते रहे, लेकिन उनकी आंखों से आंसू बहते रहे और वे एक शब्द भी नहीं बोले।
 
Nityananda and Gaurachandra kept looking at each other, but tears kept flowing from their eyes and they did not utter a single word.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)