श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 4: नित्यानंद की महिमा का प्रकटन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.4.29 
“যে অনন্ত নিরবধি ধরে বিশ্বম্ভর
আজি তার গর্ব চূর্ণ—কোলের ভিতর”
“ये अनन्त निरवधि धरे विश्वम्भर
आजि तार गर्व चूर्ण—कोलेर भितर”
 
 
अनुवाद
“विश्वम्भर को निरन्तर धारण करने वाले अनन्त का अभिमान आज भगवान की गोद में रहते हुए चूर-चूर हो गया।”
 
“The pride of Anant, who constantly holds the Vishvambhar, was shattered today while he was in the lap of God.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)