श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 4: नित्यानंद की महिमा का प्रकटन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.4.19 
পুনঃ পুনঃ বাদে সুখ অতি অনিবার
ধরেন সবাই—কেহ নারে ধরিবার
पुनः पुनः बादे सुख अति अनिवार
धरेन सबाइ—केह नारे धरिबार
 
 
अनुवाद
उनकी खुशी लगातार बढ़ती जा रही थी। हालाँकि उन्होंने उन्हें थामे रखने की कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे।
 
His joy continued to grow. Although he tried to contain it, he failed.
तात्पर्य
अनिवार शब्द उन चीज़ों को संदर्भित करता है जिन्हें रोका नहीं जा सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)