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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 4: नित्यानंद की महिमा का प्रकटन
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श्लोक 16
श्लोक
2.4.16
বিশ্বম্ভর-মুখ চাহি’ ছাডে ঘন-শ্বাস
অন্তরে আনন্দ, ক্ষণে ক্ষণে মহা-হাস
विश्वम्भर-मुख चाहि’ छाडे घन-श्वास
अन्तरे आनन्द, क्षणे क्षणे महा-हास
अनुवाद
विश्वम्भर के मुख की ओर देखते हुए उन्होंने गहरी साँस ली। उनका हृदय आनंद से भर गया और वे बार-बार ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
Looking at Vishvambhara's face, he took a deep breath. His heart filled with joy, and he burst into loud laughter again and again.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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