श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.3.86 
“প্রাণ-ভিক্ষা করিলেন আমার সন্ন্যাসীনা
দিলে ও ’সর্ব-নাশ হয’ হেন বাসি
“प्राण-भिक्षा करिलेन आमार सन्न्यासीना
दिले ओ ’सर्व-नाश हय’ हेन वासि
 
 
अनुवाद
“इस संन्यासी ने मेरा प्राण मांगा है; और यदि मैं उसे प्राण नहीं दूंगा तो मेरा नाश हो जाएगा।
 
“This monk has asked for my life; and if I do not give it to him, I will perish.
तात्पर्य
वैष्णव सन्यासी के हृदय-विदारक वचनों को सुनकर ब्राह्मण अत्यंत दुखी और व्याकुल हो गया और सोचने लगा, "मैं केवल शरीर हूँ, और मेरा सबसे बड़ा पुत्र प्राणवायु है। इसलिए, यह सन्यासी मेरे प्राण हर लेगा और मेरे शरीर को यहीं छोड़ देगा। अगर मैं उनकी बात नहीं मानता, तो मुझे आसन्न ख़तरे का सामना करना पड़ेगा।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)