श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  2.3.78 
নিত্যানন্দ-পিতা তানে ভিক্ষা করাইরা
রাখিলেন পরম-আনন্দ-যুক্ত হঞা
नित्यानन्द-पिता ताने भिक्षा कराइरा
राखिलेन परम-आनन्द-युक्त हञा
 
 
अनुवाद
नित्यानंद के पिता ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें अपने घर में ठहराया।
 
Nityananda's father invited him for a meal and happily hosted him in his house.
तात्पर्य
अपार हर्ष के साथ, हड़ाई पंडित ने एक आकर्षक पर्यटक सन्यासी को अपने घर आमंत्रित किया और उसे भोजन कराया। चूंकि पंच-सूना बलिदान स्वतंत्र सन्यासियों के लिए नहीं होते हैं, वे ब्राह्मणों के घरों में भोजन करते हैं। सन्यासियों को, जो आध्यात्मिक जीवन के सर्वोच्च क्रम में स्थित हैं, भोजन और अन्य गैर-द्वंद्व सेवा प्रदान करना गृहस्थों का प्रमुख कर्तव्य है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)