श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.3.6 
আছুক দাসের কার্য, সে-প্রেম দেখিতে
শুষ্ক-কাষ্ঠ-পাষাণাদি মিলায ভুমিতে
आछुक दासेर कार्य, से-प्रेम देखिते
शुष्क-काष्ठ-पाषाणादि मिलाय भुमिते
 
 
अनुवाद
उसके प्रेम को देखकर सूखी लकड़ी और पत्थर भी पिघल जाते थे, उसके सेवकों की तो बात ही क्या?
 
Even dry wood and stones would melt at the sight of his love, what to say of his servants?
तात्पर्य
शुष्क काष्ठ में जल का नाम नहीं, पाषाण में भी नहीं । गौरसुन्दर के प्रेम प्रकटीकरण से जिन्हके हृदय काष्ठ समान शुष्क पाषाण समान कठोर थे, उनमें भी प्रेम की बाढ़ आ गई । उनके सेवकों के सेवा से उनके सब सेवक ईश्वर प्रेम में तन्मय हो गए । उनकी प्रेमामृता को पीकर वे जड़ भी निर्जीव पदार्थ भी पिघल गए जो उनके शृंगार को देखने के योग्य नहीं थे ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)