श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.3.50 
সেবকের হিṁসা মুই না পারোঙ্ সহিতে
কাটিনু আপন পুত্র সেবক রাখিতে
सेवकेर हिꣳसा मुइ ना पारोङ् सहिते
काटिनु आपन पुत्र सेवक राखिते
 
 
अनुवाद
“मैं अपने सेवकों पर अत्याचार सहन नहीं कर सकता, इसलिए मैंने अपने सेवकों की रक्षा के लिए अपने ही पुत्र को मार डाला।
 
“I cannot tolerate the oppression of my servants, so I killed my own son to protect my servants.
तात्पर्य
"मैं अपने प्यारे सेवकों के प्रति किसी भी तरह की ईर्ष्या या घृणा को बर्दाश्त नहीं कर सकता। यही कारण है कि मैंने अपने भक्तों का पक्ष लिया और अपने ही पुत्र का वध कर दिया।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)