श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  2.3.40 
পুণ্য পবিত্রতা পায যে-অঙ্গ-পরশে
তাহা’মিথ্যা বলে বেটা কেমন সাহসে?
पुण्य पवित्रता पाय ये-अङ्ग-परशे
ताहा’मिथ्या बले बेटा केमन साहसे?
 
 
अनुवाद
"मेरे शरीर के स्पर्श से पवित्रता पवित्र हो जाती है। तो वह दुष्ट कैसे कह सकता है कि मेरा शरीर मिथ्या है?"
 
"The touch of my body purifies the sacred. So how can that evil person say that my body is false?"
तात्पर्य
"परम पुरुषोत्तम का शरीर नित्य है। इसलिए उसमें दुख, निरर्थकता, घृणा और द्वंद्व नहीं हो सकते। भगवान के ऐसे अत्यधिक पवित्र अंगों के स्पर्श से कम शुद्ध चीजें बहुत शुद्ध हो जाती हैं। इसलिए मैं समझ नहीं पा रहा कि वह ऐसे शाश्वत शरीर को अस्थायी कैसे मान सकता है।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)