“वेद मुझ पर हाथ, पैर, मुंह या आंखें न होने का आरोप लगाकर मेरा उपहास करते हैं।
“The Vedas ridicule me by accusing me of having no hands, legs, mouth or eyes.
तात्पर्य
अनिर्वादीय शास्त्र को समझने में असमर्थ रहते हैं, और वे भगवान के चरणों और हाथों को भौतिकवादी के रूप में वर्णन करते हैं, इस आधार पर वे मानते हैं कि भगवान का कोई आकर नहीं होता और वे कोई लीला नहीं करते। लेकिन अगर कोई व्यक्ति किसी शब्द का अर्थ जानने के लिए vidvad-rūḍhi अर्थात् ज्ञानी व्यक्ति द्वारा स्वीकृत अर्थ को स्वीकार करता है, तो इस बात को आसानी से समझ पाएगा कि भगवान के हाथ, पैर, मुंह और आंखें आध्यात्मिक होती हैं न कि भौतिक। इसका उल्लेख वेदों (श्वेताश्वतर उपनिषद 3.19) में इस प्रकार किया गया है: अपाणि-पादो जवनो ग्रहीता पश्यत्य चक्षुः स शृणोत्य कर्णः-"हालांकि भगवान के पास हाथ और पैर नहीं हैं, फिर भी वह सभी बलिदान स्वीकार करते हैं; हालाँकि उनकी आँखें नहीं हैं, फिर भी वह सब कुछ देखते हैं; और हालाँकि उनके कान नहीं हैं, फिर भी वह सब कुछ सुनते हैं।" जो लोग वेदों के वास्तविक उद्देश्य को समझ नहीं पाते हैं और परिणामस्वरूप भ्रमित हो जाते हैं, उन पर दया करने के लिए, श्री गौर हरि ने वेदों की ऐसी समझ का सम्मान नहीं किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥