यावान अहम यथा-भावो
यद्-रूप-गुण-कर्मकः
तथैव तत्त्व-विज्ञानं
अस्तु ते मद्-अनुग्रहात्
“मेरा समस्त अस्तित्व, अर्थात् मेरा वास्तविक शाश्वत रूप, मेरा पारलौकिक अस्तित्व, रंग, गुण और कर्म – वे सभी तुम्हारे भीतर वास्तविक ज्ञान के द्वारा जागृत हो सकें, मेरी निःस्वार्थ भावना से।” भले ही एक सशर्त आत्मा प्रभु के निवास में रहे, फिर भी प्रभु की शक्तियों के बारे में उसका अज्ञान मिटता नहीं है। केवल वे ही इन सभी तथ्यों को समझ पाते हैं, जिन पर प्रभु की कृपा होती है। यह निम्नलिखित शब्दों में पुष्टि की गई है: यम एवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम—“प्रभु केवल उसी को प्राप्त होते हैं जिसे वे स्वयं चुनते हैं। ऐसे व्यक्ति के समक्ष वे स्वयं अपना रूप प्रकट करते हैं।”
