श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  2.3.28-29 
অনন্ত ব্রহ্মাণ্ড যার এক ফণে ধরে
সহস্র-বদন হৈ’ যারে স্তুতি করে
তবু নাহি পায অন্ত, সেই প্রভু কয
তোমার স্তবেতে আর কে সমর্থ হয?
अनन्त ब्रह्माण्ड यार एक फणे धरे
सहस्र-वदन है’ यारे स्तुति करे
तबु नाहि पाय अन्त, सेइ प्रभु कय
तोमार स्तवेते आर के समर्थ हय?
 
 
अनुवाद
"भगवान अनंत, जो अपने एक फण पर अनंत ब्रह्मांडों को धारण करते हैं, अपने सहस्र मुखों से निरंतर आपकी स्तुति करते हैं। फिर भी वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे अभी अंत तक नहीं पहुँचे हैं। अतः आपकी स्तुति करने में और कौन समर्थ है?
 
"Lord Ananta, who holds the infinite universes on one of His hoods, constantly praises You with His thousand mouths. Yet He Himself admits that He has not yet reached the end. So who else is capable of praising You?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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