जैसे ही भगवान मुरारी के घर में प्रविष्ट हुए, उन्होंने "सूअर, सूअर" पुकारा। मुरारी गुप्त चकित होकर चारों ओर देखने लगे। फिर विश्वम्भर विष्णु मंदिर में प्रविष्ट हुए, जहाँ उन्होंने एक सुंदर टोंटी वाला जलपात्र देखा। भगवान ने तुरन्त वराह रूप धारण किया और अपनी मधुर इच्छा से उस जलपात्र को अपने दाँतों से उठा लिया। वराह रूप में, समस्त यज्ञों के परम भोक्ता ने घुरघुराहट की और चार खुर प्रकट किए। तब भगवान ने आदेश दिया, "मुरारी, मेरी स्तुति करो!"
As soon as the Lord entered Murari's house, he called out, "Pig, pig!" Murari Gupta looked around in astonishment. Then he entered the Vishvambhara Vishnu temple, where he saw a water pot with a beautiful spout. The Lord immediately assumed the form of Varaha and, with His sweet desire, lifted the water pot with His teeth. In the form of Varaha, the supreme enjoyer of all sacrifices, growled and revealed four hooves. Then the Lord commanded, "Murari, praise Me!"
तात्पर्य
गौराहारी तीव्र गति से मुराड़ी के घर की ओर दौड़े, जहाँ उन्होंने विष्णु मंदिर में प्रवेश करते हुए "सूकर, सूकर" कहते हुए पुकारा। गौरासुंदर से अचानक सुनने को मिली दहाड़ और “सूकर, सूकर” शब्दों से मुराड़ी समझ नहीं पाया कि क्या घट रहा है। जब प्रभु ने विष्णु मंदिर के भीतर एक बड़ा जलपात्र देखा, तो उन्होंने उसे अपने दांतों से उठा लिया। उस समय मुराड़ी ने देखा कि प्रभु चार पैर वाले सूकर के रूप में गुर्रा रहे थे, जो सभी यज्ञों के भोक्ता हैं। वराहदेव भगवान विष्णु के अवतार हैं। इसलिए, भगवान गौरासुंदर के अपने यथाउचित भक्त के लिए अपने वराह अवतार का रूप प्रदर्शित करना उचित था। एक मायावादी को इससे यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि जब एक बद्ध आत्मा अज्ञानता से मुक्त हो जाती है तो वह प्रभु की नकल करते हुए ऐसे मूड प्रदर्शित करने में सक्षम होती है। इस तरह से अपने आप को विष्णु मानकर ठगे जाने वाले उन कपटी नारकीय लोगों का अनादर करने के लिए प्रभु ने व्यक्तितगत रूप से उनके भ्रम के लिए ये लीलाएँ प्रस्तुत कीं। शाश्वत रूप से विरोधी नास्तिक प्रभु के गुणों को समझे बिना उनकी गतिविधियों की नकल करके भ्रम में पड़ जाते हैं। इस प्रकार वे कुछ कपटी लोगों के लिए इस प्रकार सम्मान की व्यवस्था करके इस दुनिया में तबाही लाते हैं कि नारकीय जीवन की पीड़ादायक स्थितियाँ, जो ऐसे ईर्ष्यालु लोगों के लिए उपयुक्त प्रतिफल हैं, आने वाले असीमित वर्षों के लिए कष्टों के साथ उनका इंतजार करती हैं। गुप्त अवतार, श्री गौरासुंदर ने अपनी पहचान, यहाँ तक कि अपने भक्तों से भी गुप्त रखी। यदि एक घृणित बद्ध आत्मा जो नारकीय जीवन के असीमित वर्षों तक कष्ट उठाने के योग्य है और जो प्रतिदिन जीवन की तीन परिस्थितियों से गुजरती है, वह परम प्रभु को अपने जैसी एक जीवित संतान मानता है और अपने ठगे हुए अनुयायियों द्वारा सम्मानित किए जाने के लिए विशेष प्रयास करता है, तो ऐसा धोखेबाज व्यक्ति और धोखा खाने वाले इंसान कहलाने की अपनी योग्यता खो देते हैं। और एक मल खाने वाले सूकर जैसे चार पैरों की अनुपस्थिति के कारण, दो पैर वाले जानवर बन जाते हैं। ऐसे दो पैर वाले जानवर कभी भी चार पैर प्रदर्शित नहीं कर सकते। हालाँकि, भविष्य के किसी जीवन में, वे चार पैर वाले, मल खाने वाले जानवर बन जाएंगे। श्री चैतन्यदेव ने अपने वराह अवतार के चार पैरों का प्रदर्शन किया, और यदि एक महत्वहीन जीवित संतान उनके लीलाओं की नकल करने की कोशिश करती है, तो यह केवल हास्यास्पद है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥