श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.3.145 
বাম-শ্রুতি-মূলে এক কুণ্ডল বিচিত্র
হলধর-ভাব হেন বুঝি যে চরিত্র
वाम-श्रुति-मूले एक कुण्डल विचित्र
हलधर-भाव हेन बुझि ये चरित्र
 
 
अनुवाद
"उनके बाएँ कान में सुन्दर कुण्डल सुशोभित था। उनके स्वरूप से मैं समझ गया कि वे कोई और नहीं, बल्कि हलधर ही थे।"
 
"His left ear was adorned with a beautiful earring. From his appearance I understood that he was none other than Haldhar."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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