श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  2.3.143 
তার মাঝে দেখি এক প্রকাণ্ড শরীর
মহা এক স্তম্ভ স্কন্ধে, গতি নহে স্থির
तार माझे देखि एक प्रकाण्ड शरीर
महा एक स्तम्भ स्कन्धे, गति नहे स्थिर
 
 
अनुवाद
रथ के भीतर मैंने एक विशालकाय शरीर वाले व्यक्ति को देखा। उसने अपने कंधे पर एक खंभा रखा था और उसकी चाल अस्थिर थी।
 
Inside the chariot, I saw a man with a large frame. He carried a pole on his shoulder and walked unsteadily.
तात्पर्य
“मैंने एक महान व्यक्ति को बड़े शरीर के साथ देखा जो एक रथ के भीतर बैठा था जो खजूर के पेड़ के साथ चिह्नित एक ध्वज से सुशोभित था। वह अपने कंधे पर एक डंडा लिए हुए था, दूसरे शब्दों में, वह एक हल और क्लब लिए हुए था। वह बेचैनी से पागल था।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)