বণিক্ অধম মূর্খ যে করিলা পার
ব্রহ্মাণ্ড পবিত্র হয নাম লৈলে যাঙ্র
वणिक् अधम मूर्ख ये करिला पार
ब्रह्माण्ड पवित्र हय नाम लैले याङ्र
अनुवाद
जिसने पतितों, मूर्खों और व्यापारियों का उद्धार किया, उसके नाम का कीर्तन करने से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पवित्र हो जाता है।
By chanting the name of the one who saved the fallen, the fools and the traders, the entire universe becomes pure.
तात्पर्य
जब कृष्ण के शाश्वत सेवक इस संसार के वर्ण सिद्धांतों में अपने को स्थापित करते हैं, तो वे तीसरे वर्ण के सदस्यों के रूप में व्यापार में प्रवृत्त होते हैं। ऐसे समुदायों को वैश्य या वाणिक कहा जाता है। अपनी प्रवृत्तियों को संचालित करने के लिए, वे अपना समय गायों की रक्षा करने, भूमि की खेती करने, व्यापार करने और ब्याज पर धन उधार देने में व्यतीत करते हैं। जब कोई कृष्ण को भूल जाता है, तो उसे व्यापारी की प्रवृत्तियों का स्वाद विकसित हो जाता है और ऐसी इच्छाओं के परिणामस्वरूप वह व्यापारी के घर में जन्म लेता है। ऐसे व्यापारियों पर निर्भर होने के कारण, अन्य समुदाय उन्हें श्रेष्ठी (अभिजात), आढ़्य (समृद्ध), और महाजन (थोक व्यापारी) जैसे उपाधियों से सम्मानित करते हैं। इस तरह से सम्मानित होने के परिणामस्वरूप, ऐसे व्यापारी गर्वीले हो जाते हैं। किसी व्यापारी की श्रेष्ठता और हीनता उन वस्तुओं द्वारा निर्धारित की जाती है जिनमें वह व्यापार करता है। जिनका व्यवसाय मादक पदार्थ बेचना है वे भी व्यापारी हैं, लेकिन वे अन्य व्यापारियों की तुलना में कम श्रेष्ठ हैं। फिर भी उन्हें भी वैश्य माना जाता है। चूंकि सोने के आदान-प्रदान में लीन होकर हरि की सेवा करने की जीव की प्रवृत्ति बहुत बाधित होती है, इसलिए स्वर्ण व्यापारियों की निंदा की जाती है और उन्हें हीन वैश्य भी माना जाता है। ऐसे परिवारों में प्रकट हुए व्यक्ति और साथ ही पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण समान प्रवृत्तियाँ रखने वालों को नित्यानंद प्रभु ने पदार्थ में उनकी तल्लीनता से मुक्त किया और आचार्य की उपाधि प्रदान की। बाहरी पहचान अस्थायी हैं। जब ऐसी सभी पहचानें हट जाती हैं, तो जीव अपने संवैधानिक स्थिति में जाग जाता है। फिर वह मुक्त हो जाता है और हरि की सेवा में लग जाता है। भौतिक दृष्टि से, लोग उच्च, मध्यम या निम्न वर्ग के होते हैं। बुद्धिमान व्यक्तियों की दृष्टि से, लोग या तो विद्वान होते हैं, अशिक्षित या मूर्ख। ये बाहरी पहचानें कृष्ण के शाश्वत सेवकों की बुद्धि को अस्थायी रूप से ढँक लेती हैं और उन्हें पदार्थ में लीन कर देती हैं। आत्मिक चेतना को भूलने के कारण एक निष्क्रिय आत्मा भगवान की सेवा से वंचित हो जाती है और अपनी शाश्वत पहचान भूल जाती है। अपने निर्देशों द्वारा, श्री नित्यानंद प्रभु जीवों की पदार्थ में तल्लीनता को दूर करते हैं और उन्हें शाश्वत लाभ प्रदान करते हैं। जीव तब भौतिक अवधारणाओं से मुक्त हो जाते हैं और आध्यात्मिक राज्य की यात्रा करते हैं। मुक्त आत्माओं की बाहरी पहचान उन लोगों को चकित करती है जो स्वयं को पदार्थ से पहचानने में व्यस्त हैं और उन्हें कर्म के नियमों में उलझा देती हैं। व्यापारिक प्रवृत्तियों वाले व्यक्तियों और व्यापारी परिवारों में जन्म लेने वालों के साथ-साथ मूर्ख जो सामान्य लोगों द्वारा निंदित किए जाते हैं, उनके लाभ के लिए, नित्यानंद प्रभु, जो असीम रूप से दयालु हैं, ने उन्हें उनकी भौतिक अवधारणाओं से मुक्त किया। केवल नित्यानंद प्रभु का नाम सुनने से ही, पूरे संसार के लोग पाप करने की प्रवृत्ति से शुद्ध हो जाते हैं। यहाँ तक कि व्यापारी, पतित और मूर्ख भी शुद्ध हो जाते हैं और परम सत्य के ज्ञाता और भगवान के भक्त बन जाते हैं। तब कोई भी उनकी शुद्धता पर संदेह नहीं कर सकता। अंट्य-खंड, अध्याय पांच देखें।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥