श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 131
 
 
श्लोक  2.3.131 
পরম কৃপায করে সবারে সম্ভাষ
শুনিলে শ্রী-মুখ-বাক্য কর্ম-বন্ধ-নাশ
परम कृपाय करे सबारे सम्भाष
शुनिले श्री-मुख-वाक्य कर्म-बन्ध-नाश
 
 
अनुवाद
वे सभी से बड़ी करुणा से बोले। उनके मुखकमल से वचन सुनकर मनुष्य का सकाम कर्मों का बंधन नष्ट हो गया।
 
He spoke to everyone with great compassion. Hearing his words from his mouth, man's bondage to fruitive actions was destroyed.
तात्पर्य
श्री नित्यानंद प्रभु के कमल मुँह से निकले वाक्यों को जो सुनता है उसके पास भौतिक धारणाओं को बनाए रखने की कोई गुंजाइश ही नहीं है। बद्ध आत्माएँ अभिमानस है ,और खुद को कर्ता मानती हैं और खुद को पदार्थ का परिणाम समझते हुए भौतिक गतिविधियों में लिप्त होती हैं। जीव श्री नित्यानंद प्रभु के वाक्यों को सुनते हैं, तो भौतिक भोग की उनकी प्यास मिट जाएगी और उनकी सांवैधानिक प्रवृत्तियाँ जागृत हो जाएँगी। वह अपने सबसे करुणामय शब्दों से सभी को प्रसन्न करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)