श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  2.3.128 
কোটি চন্দ্র জিনিযা বদন মনোহর
জগত-জীবন হাস্য সুন্দর অধর
कोटि चन्द्र जिनिया वदन मनोहर
जगत-जीवन हास्य सुन्दर अधर
 
 
अनुवाद
उनका आकर्षक चेहरा लाखों चंद्रमाओं की सुंदरता को मात देता था और उनकी मनमोहक मुस्कान ब्रह्मांड का जीवन और आत्मा थी।
 
His charming face surpassed the beauty of millions of moons and his captivating smile was the life and soul of the universe.
तात्पर्य
इस श्लोक की दूसरी पंक्ति इस बात को इंगित करती है कि उनकी खूबसूरत मुस्कान ने पूरे ब्रह्मांड के सभी जीवों को जीवन दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)