सर्वभूतेषु यः पश्येद
भगवद्भावमात्मनः
भूतानि भगवत्य ात्मनि
एष भागवत उत्तमः
"सबसे उन्नत भक्त प्रत्येक वस्तु में सभी आत्माओं की आत्मा को, परमेश्वर श्री कृष्ण को देखता है। परिणामस्वरूप वह हर चीज़ को परमेश्वर के संबंध में ही देखता है और समझता है कि हर चीज़ जो है वह परमात्मा के भीतर अनंत काल से स्थित है।" ऐसी मुक्त आत्माओं के श्रेष्ठतम होने के नाते, महाभागवत श्री नित्यानंद प्रभु भगवान के सभी विशुद्ध भक्तों के मूल हैं। वे अत्यंत प्रकाशमान हैं और आध्यात्मिक रोशनी के आधार हैं। उनके शारीरिक तेज का प्रतिबिंब जीवों की मूल स्थिति को पुनर्जीवित करता है। जो लोग उनके आश्रय में हैं, उनसे भी समान तेज प्राप्त कर सकते हैं। जीवन की भौतिक अवधारणा में आध्यात्मिक तेज का अभाव होता है। जब तक कोई आध्यात्मिक साक्षात्कार प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक वह अपनी वास्तविक पहचान को भूलने के दूषित होने से मुक्त नहीं हो सकता। जब नित्यानंद से उत्पन्न और अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाला आध्यात्मिक तेज किसी व्यक्ति के हृदय में प्रवेश करता है, तो वह अज्ञान के अंधकार को मिटा देता है।
