श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  2.3.121 
নিরন্তর সঙ্কীর্তন—পরম-আনন্দ
দুঃখ পায প্রভু না দেখিযা নিত্যানন্দ
निरन्तर सङ्कीर्तन—परम-आनन्द
दुःख पाय प्रभु ना देखिया नित्यानन्द
 
 
अनुवाद
भगवान् अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक निरन्तर संकीर्तन में लगे रहते थे, फिर भी नित्यानंद को न देख पाने के कारण वे दुःखी हो जाते थे।
 
The Lord was constantly engaged in chanting with great joy, yet he became sad because he could not see Nityananda.
तात्पर्य
जब महाप्रभु नबद्वीप में निरन्तर और प्रसन्नतापूर्वक संकीर्तन का प्रचार कर रहे थे, उन्हें नित्यानंद प्रभु की अनुपस्थिति से कष्ट हुआ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)