আহারের চেষ্টা নাহি করেন কোথায
বাল্য-ভাবে বৃন্দাবনে গডাগডি যায
কেহ নাহি বুঝে তান চরিত্র উদার
কৃষ্ণ-রস বিনে আর না করে আহার
কদচিত্ কোন দিন করে দুগ্ধ-পান
সেহ যদি অযাচিত কেহ করে দান
उन्होंने कभी भोजन के लिए प्रयास नहीं किया और बार-बार बालक की भांति वृंदावन की धूल में लोटते रहे। कोई भी उनके उदार गुणों को समझ नहीं सका। वे कृष्णभावनामृत के अलावा कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे। कभी-कभी यदि कोई उन्हें बिना माँगे दूध दे देता, तो वे उसे पी लेते थे।
He never sought food and repeatedly rolled in the dust of Vrindavan like a child. No one could understand his generous nature. He would not accept anything except Krishna consciousness. Sometimes, if someone offered him milk without asking, he would drink it.
तात्पर्य
श्री नित्यानंद प्रभु के वृंदावन की धूल में लोट-पोट होने के लीलाओं को कोई नहीं समझ सकता। अपने शरीर को बनाए रखने के लिए सभी जीवों को भोजन इकट्ठा करने की आवश्यकता होती है, लेकिन जब किसी की सांविधानिक प्रवृत्तियाँ जागृत होती हैं, तो वह विष्णु और वैष्णवों की सेवा के भावों को छोड़कर किसी अन्य चीज को जमा करने में रुचि खो देता है। नित्यानंद प्रभु अपने शरीर का भरण-पोषण बिना मांगे दूध पीकर करते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥