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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन
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श्लोक 116
श्लोक
2.3.116
নিরবধি বাল্য-ভাব, আন নাহি স্ফুরে
ধূলাখেলা খেলে বৃন্দাবনের ভিতরে
निरवधि बाल्य-भाव, आन नाहि स्फुरे
धूलाखेला खेले वृन्दावनेर भितरे
अनुवाद
वे सदैव बालक के समान भाव में रहते थे, अन्य कोई भाव प्रदर्शित नहीं करते थे, जैसे वे वृन्दावन की धूल में खेलते थे।
He always remained in the mood of a child, displaying no other emotion, as he played in the dust of Vrindavan.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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