श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान का मुरारी के घर में वराह रूप में प्रतिष्ठान और नित्यानंद से मिलन  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  2.3.115 
চিনিতে না পারে কেহ অনন্তের ধাম
হুঙ্কার করযে দেখি’ পূর্ব-জন্ম-স্থান
चिनिते ना पारे केह अनन्तेर धाम
हुङ्कार करये देखि’ पूर्व-जन्म-स्थान
 
 
अनुवाद
कोई भी अनंत के मूल नित्यानंद को नहीं पहचान सका, क्योंकि वे अपने पूर्व जन्मस्थान को देखकर जोर से गर्जना कर रहे थे।
 
No one could recognize the original Nityananda of Ananta, as he roared loudly upon seeing his former birthplace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)