श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.28.99 
নিন্দা-দ্বেষ-আদি যার মনেতে আছিল
প্রভুর বিরহ-সর্প পাষণ্ডে দṁশিল
निन्दा-द्वेष-आदि यार मनेते आछिल
प्रभुर विरह-सर्प पाषण्डे दꣳशिल
 
 
अनुवाद
जो लोग अपराध और ईर्ष्या से भरे हुए थे, उन्हें भी प्रभु के वियोग के साँप ने डस लिया।
 
Those who were filled with guilt and jealousy were also bitten by the snake of separation from the Lord.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)