श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  2.28.95 
কেহ বলে,—“চল ঘরে দ্বারে অগ্নি দিযা
কাণে পরিঽ কুণ্ডল চলিব যোগী হঞা
केह बले,—“चल घरे द्वारे अग्नि दिया
काणे परिऽ कुण्डल चलिब योगी हञा
 
 
अनुवाद
किसी ने कहा, "चलो अपने घर जला दें और यह जगह छोड़ दें। हम भिक्षुक योगी बन सकते हैं और हाथीदांत की बाली पहनकर भिक्षुक का चिन्ह स्वीकार कर सकते हैं।"
 
Someone said, "Let's burn our houses and leave this place. We can become mendicant yogis and accept the symbol of a mendicant by wearing ivory earrings."
तात्पर्य
ऐहिक भूमि में श्री गौरसुन्दर के संन्यास लेने का ज्ञान होने पर कुछ लोगोंने विचार किया कि हम अपने-अपने घरों को जलाकर इस स्थान को छोड़कर काँफाट योगी बनेंगेl काफ़ाट योगी अपने कानों में छेद करके उन दो छेदों में खूंटे डालकर अपने कानों के पर्दों को ढँककर वाह्य ध्वनि स्पंदनों को कानों में प्रवेश करने से रोकते हैंl
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)