श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.28.87 
নাগরিযা যত ভক্ত, তারা কান্দে অবিরত,
বাল-বৃদ্ধ নাহিক বিচার
কাঙ্দে সব স্ত্রী-পুরুষে, পাষণ্ডী-গণ হাসে,
ঽনিমাইরে না দেখিমু আরঽ
नागरिया यत भक्त, तारा कान्दे अविरत,
बाल-वृद्ध नाहिक विचार
काङ्दे सब स्त्री-पुरुषे, पाषण्डी-गण हासे,
ऽनिमाइरे ना देखिमु आरऽ
 
 
अनुवाद
क्या जवान, क्या बूढ़े, क्या स्त्री, क्या पुरुष—शहर से आए सभी भक्त लगातार रो रहे थे। लेकिन नास्तिक हँसकर बोले, "अब हम निमाई को फिर कभी नहीं देखेंगे।"
 
All the devotees from the city—young and old, men and women—were weeping incessantly. But the atheists laughed and said, "We will never see Nimai again."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)