श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.28.56 
সṁযোগ-বিযোগ যত করে সেই নাথ
তান ইচ্ছা বুঝিবারে শক্তি আছে কাঽত
सꣳयोग-वियोग यत करे सेइ नाथ
तान इच्छा बुझिबारे शक्ति आछे काऽत
 
 
अनुवाद
“परमेश्वर की इच्छा को कौन समझ सकता है, जिसके कारण जीव कभी मिलते हैं और कभी अलग हो जाते हैं?
 
“Who can understand the will of God, which causes creatures to sometimes meet and sometimes separate?
तात्पर्य
जिस प्रकार प्रकृति में सृष्टि, स्थिति और विनाश का नियम है, उसी प्रकार संसार में मिलाप में सुख और बिछुड़ने में दुख है। किन्तु जो लोग भगवान की भक्ति छोड़कर भौतिक सुखों में आनन्द लेना चाहते हैं, वे ईश्वर की इच्छा से ईश्वर के अधीन रहते हैं। जो लोग भगवान की सेवा न करते हुए भी भगवान की इच्छा के विरुद्ध कामनाएँ करते हैं, उन्‍हें अंततः अपनी कमजोरी का भान हो जाता है और वे भगवान के शरणागत हो जाते हैं। जो जन भगवान की सेवा के शत्रु होते हैं, वे कृष्ण की शक्ति को समझ नहीं पाते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)