श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.28.53 
দণ্ডে দণ্ডে যত স্নেহ করিলা আমারে
আমি কোটী-কল্পে ও নারিব শোধিবারে
दण्डे दण्डे यत स्नेह करिला आमारे
आमि कोटी-कल्पे ओ नारिब शोधिबारे
 
 
अनुवाद
“आपने हर क्षण मुझ पर जो स्नेह दिखाया है, वह करोड़ों कल्पों में भी चुकाने से अधिक है।
 
“The affection you have shown me every moment is more than I can repay even in millions of eons.
तात्पर्य
प्रस्थान के समय श्री गौरासुंदर ने अपनी माता से कहा, "मेरी सेवा के अतिरिक्त आपने अपने सुख के लिए और कुछ नहीं किया है। इसलिए मैं करोड़ों कल्पों में भी आपका ऋण चुका नहीं पाऊंगा।"

अखिल नित्य श्री गौरासुंदर अपनी नित्य माता को कभी नहीं छोड़ते। इसलिए पारम वैष्णव प्रेमिका श्री शची देवी जो कि पारम वैष्णव आनंद स्वरूपा हैं, अखिल नित्य लीला में श्री गौरासुंदर के वैष्णव प्रेम की आधार हैं। वे कभी भी एक पल के लिए भी उनके सान्निध्य से हटती नहीं हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)