श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.28.4 
নিরবধি পরানন্দ সঙ্কীর্তন-রঙ্গে
হরিষে থাকেন সর্ব-বৈষ্ণবের সঙ্গে
निरवधि परानन्द सङ्कीर्तन-रङ्गे
हरिषे थाकेन सर्व-वैष्णवेर सङ्गे
 
 
अनुवाद
भगवान अपने भक्तों के साथ कीर्तन करते समय सदैव दिव्य सुख का अनुभव करते थे।
 
The Lord always experienced divine bliss while singing kirtan with his devotees.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)