श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.28.26 
বল কৃষ্ণ, ভজ কৃষ্ণ, গাও কৃষ্ণ-নাম
কৃষ্ণ বিনু কেহ কিছু না ভাবিহ আন
बल कृष्ण, भज कृष्ण, गाओ कृष्ण-नाम
कृष्ण विनु केह किछु ना भाविह आन
 
 
अनुवाद
"कृष्ण की महिमा करो, कृष्ण की पूजा करो और कृष्ण का नाम जपो। कृष्ण के अलावा किसी और चीज़ के बारे में मत सोचो।"
 
"Glorify Krishna, worship Krishna and chant the name of Krishna. Don't think about anything else except Krishna."
तात्पर्य
कृष्ण के नाम को जपने से व्यक्ति उन विषयों पर चर्चा करने की योग्यता खो देता है जो कृष्ण से संबंधित नहीं हैं। यदि कोई कृष्ण के नाम का गान करता है, तो उसकी शाश्वत प्रसन्नता और अन्य सभी की प्रसन्नता बढ़ती है। कृष्ण के नाम की पूजा करने से व्यक्ति स्वयं कृष्ण की पूजा करता है। "कृष्ण" उन वस्तुओं से अलग हैं जिन्हें ढकी हुई दृष्टि के माध्यम से कृष्ण से श्रेष्ठ (?) के रूप में देखा जाता है, इसलिए व्यक्ति को "कृष्ण" का जप करना चाहिए, "कृष्ण" का वर्णन करना चाहिए, और "कृष्ण" की पूजा करनी चाहिए। "कृष्ण" के अलावा किसी भी शब्द या नाम को याद रखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अन्य सभी कमोबेश कृष्ण से अलग हैं, वे जीवित संस्था को कृष्ण को प्राप्त करने के पूर्ण शुभता को प्राप्त करने का कोई अवसर प्रदान नहीं करते हैं। कृष्ण से श्रेष्ठ की अवधारणा कृष्ण प्राप्ति का एक ढका हुआ रूप है और केवल कृष्ण को कृष्ण के आनंद के भंडार से अलग करती है। रसों को जोड़ने के बहाने कृष्ण के आनंद भंडार की पूर्णता को बढ़ाने का प्रयास करने से रसों का एक घृणित मिश्रण होता है। स्वयं-रूप कृष्ण भगवान की सभी अभिव्यक्तियों के स्रोत हैं, इसलिए यदि कोई कृष्ण को याद नहीं रखता है, तो वह अपूर्णता, अशुद्धता, क्षणभंगुरता या कारावास के दोषों का दोषी है। यदि कोई कृष्ण की स्थिति को अनादि या अजन्मा के रूप में अस्वीकार करने का प्रयास करता है, या आदि या सभी की उत्पत्ति, उसे अपने सच्चिदानंद स्वरूप से अलग करके, तो उस पर भौतिक आनंद की भावना द्वारा हमला किया जाता है। संज्ञा जड़ में संकेतित आकर्षण bhū-vācaka, या कॄष पूर्ण शाश्वत अस्तित्व या पूर्ण शाश्वत ज्ञान को संदर्भित करता है, और ṇa आध्यात्मिक आनंद को संदर्भित करता है। कृष्ण से संबंधित गुणों और वस्तुओं में कारण और प्रभाव के बीच अंतर की संभावना है, लेकिन चूंकि कृष्ण और णा दोनों आकर्षक और आकर्षित हैं, इसलिए गुणों और वस्तुओं में कारण और प्रभाव के बीच कोई अंतर होने की संभावना नहीं है। अवैयक्तिकता का दर्शन भौतिक जगत की आश्रित प्रकृति से जुड़ा है। एक वस्तु की असाधारण अवधारणा जो आध्यात्मिक है, इंद्रियों से परे है, और प्रयोगात्मक ज्ञान की सीमा से परे है, "कृष्ण" नाम के योग-रूढ़ि वृत्ति में पाई जाती है। [एक शब्द का योग-रूढ़ि वृत्ति दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर प्राप्त अर्थ है, इस मामले में कृष्ण और णा.] तथ्य यह है कि वह अपने नामों से भिन्न नहीं है, वह अपने रूपों से भिन्न नहीं है, वह अपने गुणों से भिन्न नहीं है, और वह अपने शगलों से भिन्न नहीं है, योग-रूढ़ि वृत्ति में बाधित नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)