श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 193
 
 
श्लोक  2.28.193 
চৈতন্যের প্রিযতম নিত্যানন্দ-রায
প্রভু-ভৃত্য-সঙ্গ যেন না ছাডে আমায
चैतन्येर प्रियतम नित्यानन्द-राय
प्रभु-भृत्य-सङ्ग येन ना छाडे आमाय
 
 
अनुवाद
भगवान नित्यानन्द श्री चैतन्य को अत्यंत प्रिय हैं। मैं भगवान के सेवक की संगति से कभी वंचित न रहूँ।
 
Lord Nityananda is very dear to Sri Chaitanya. May I never be deprived of the company of the Lord's servant.
तात्पर्य
मैं अपने गुरुदेव श्री नित्यानन्द प्रभु की सेवा के अलावा किसी अन्य क्रिया-कलाप में कभी संलग्न न रहूं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)