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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला
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श्लोक 185
श्लोक
2.28.185
সর্ব-বৈষ্ণবের পাযে মোর নমস্কার
ইথে অপরাধ কিছু না লবে আমার
सर्व-वैष्णवेर पाये मोर नमस्कार
इथे अपराध किछु ना लबे आमार
अनुवाद
मैं समस्त वैष्णवों को सादर प्रणाम करता हूँ, ताकि वे मेरे अपराधों को अनदेखा कर दें।
I offer my respectful obeisances to all Vaishnavas, so that they may overlook my transgressions.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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