श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 152
 
 
श्लोक  2.28.152 
কথṁ-কথম্ অপি সর্ব-দিন-অবশেষে
ক্ষৌর-কর্ম নির্বাহ হৈল প্রেম-রসে
कथꣳ-कथम् अपि सर्व-दिन-अवशेषे
क्षौर-कर्म निर्बाह हैल प्रेम-रसे
 
 
अनुवाद
किसी तरह, प्रेम के उन्माद में, दिन के अंत में भगवान का सिर मुंडवा दिया गया।
 
Somehow, in a frenzy of love, the Lord's head was shaved at the end of the day.
तात्पर्य
श्री गौरसुन्दर के सुन्दर केशों और शिखा को दाढ़ने की तैयारी में नाई के हाथ नहीं हिल रहे थे। अनेक विचारों के कारण दाढ़ने की क्रिया में पूरा दिन बीत गया। अन्त में संन्यासी-धर्म के लिए आवश्यक दाढ़ने की क्रिया पूरी की गई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)