श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 139
 
 
श्लोक  2.28.139 
তবে মহাপ্রভু সর্ব জগতের প্রাণ
বসিলা করিতে শ্রী-শিখার অন্তর্ধান
तबे महाप्रभु सर्व जगतेर प्राण
वसिला करिते श्री-शिखार अन्तर्धान
 
 
अनुवाद
तब चैतन्य महाप्रभु, जो सबके प्राण हैं, शिखा सहित अपना सिर मुंडवाने के लिए बैठ गये।
 
Then Chaitanya Mahaprabhu, who is the life of all, sat down to have his head shaved along with the shikha.
तात्पर्य
ज्ञान प्राप्त करने के लिए, अग्नि यज्ञ से पहले शिर छीलने की शुद्धिकरण प्रक्रिया यानी चूड़ा-संस्कार से गुजरना पड़ता है। जब तक कोई शिखा नहीं रखता है, तब तक उसे कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष जैसे वैदिक साहित्य या वेदों की खोज में साहित्य का अध्ययन करने की योग्यता नहीं दी जाती है। जब भौतिक सुख के उद्देश्य से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा नष्ट हो जाती है, तो शिखा छोड़ने की व्यवस्था होती है। सांसारिक विचार के अनुसार, शिखा छोड़ना औपचारिक दायित्वों को त्यागने का लक्षण है। परंतु भगवान की सेवा के लिए, भगवान के तृदंडी भक्त भौतिक अवधारणाओं के प्रभाव में शिखा और ब्राह्मण सूत्र नहीं छोड़ते। इसके बजाय, वे शिखा और ब्राह्मण सूत्र को हरि से संबंधित मानकर परमहंस के सिद्धांतों में प्रतिष्ठित रह सकते हैं। चूंकि श्री गौरासुंदर के समय उत्तरी भारत में सकाम कर्मों का प्रदर्शन प्रमुख था, इसलिए श्री गौरासुंदर ने एकदंड-संन्यास के प्रावधानों के अनुसार अपनी शिखा और ब्राह्मण सूत्र को त्याग दिया। परंतु उनके सेवकों ने परमहंस का वस्त्र ग्रहण किया और शिखा और ब्राह्मण सूत्र को रखकर तृदंड-संन्यास के सिद्धांतों का पालन किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)