श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  2.28.119 
অনন্ত-ব্রহ্মাণ্ড-নাথ নিজ-দাস্য-ভাবে
দন্তে তৃণ করিঽ সবাঽ-স্থানে দাস্য মাগে
अनन्त-ब्रह्माण्ड-नाथ निज-दास्य-भावे
दन्ते तृण करिऽ सबाऽ-स्थाने दास्य मागे
 
 
अनुवाद
तब अनंत ब्रह्माण्डों के स्वामी ने अपने सेवक के भाव से, अपने दांतों के बीच एक तिनका लिया और सभी से भगवान कृष्ण की सेवा के लिए प्रार्थना की।
 
Then the Lord of infinite universes, in the attitude of His servant, took a straw between His teeth and prayed to everyone to serve Lord Krishna.
तात्पर्य
हालाँकि श्री व्रजेन्द्र-नंदन या स्वयं-रूप कृष्ण, चौदह लोकों के स्वामी से उनमें कोई भेद नहीं है, किन्तु लोगों को उपदेश देने के उद्देश्य से भगवान ने कृष्ण और भक्तों की सेवा के लिए पूर्ण विनम्रता और विधिवत प्रार्थना की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)