श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 28: भगवान का संन्यास ग्रहण लीला  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  2.28.110 
কৃষ্ণ-দাস্য বিনু মোর নহে কিছু আন
হেন উপদেশ তুমি মোরে দেহঽ দান”
कृष्ण-दास्य विनु मोर नहे किछु आन
हेन उपदेश तुमि मोरे देहऽ दान”
 
 
अनुवाद
"कृष्ण की सेवा के अतिरिक्त मेरी कोई अन्य इच्छा नहीं है। कृपया मुझे तदनुसार निर्देश दीजिए।"
 
"I have no other desire except serving Krishna. Please instruct me accordingly."
तात्पर्य
कुछ लोग श्री केशव भारती जी को श्रील माधवेंद्र पुरी जी का शिष्य मानते हैं। श्री गौरासुंदर ने केशव भारती जी से कहा, "तुमने कृष्ण चंद्र को अपने ह्रदय में अपने प्रिय स्वामी के रूप में स्वीकार कर लिया है। मुझे और कुछ नहीं चाहिये। मैं तो बस यह चाहता हूँ कि कृष्ण मेरी सेवा स्वीकार कर लें। कृपा करके मुझे यह वरदान दो।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)