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श्लोक 2.27.5  |
এই মত ভক্ত-গণ ভাবে নিরন্তরে
অন্ন পানি কারো নাহি রোচযে শরীরে |
एइ मत भक्त-गण भावे निरन्तरे
अन्न पानि कारो नाहि रोचये शरीरे |
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| अनुवाद |
| जब भक्तगण लगातार इस प्रकार सोचते रहे तो उन्हें भोजन और पानी की भूख समाप्त हो गई। |
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| When the devotees continued to think like this, their hunger for food and water vanished. |
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