श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 26: शुक्लाम्बर और विजय पर कृपा का वर्णन और भगवान की संन्यास की इच्छा  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  2.26.97 
ভিন্ন-ভাবে যায প্রভু, না জানে পডুযা
প্রাণ লৈযা মহা-ত্রাসে যায পলাইযা
भिन्न-भावे याय प्रभु, ना जाने पडुया
प्राण लैया महा-त्रासे याय पलाइया
 
 
अनुवाद
शिष्य को समझ नहीं आया कि भगवान किस अलग भाव से उसका पीछा कर रहे हैं। वह बहुत डर गया और अपनी जान बचाने के लिए भाग गया।
 
The disciple, not understanding the strange way in which the Lord was pursuing him, became very frightened and ran for his life.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)