श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 26: शुक्लाम्बर और विजय पर कृपा का वर्णन और भगवान की संन्यास की इच्छा  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.26.87 
এক দিন গোপী-ভাবে জগত-ঈশ্বর
ঽবৃন্দাবনঽ, ঽগোপী গোপীঽ বলে নিরন্তর
एक दिन गोपी-भावे जगत-ईश्वर
ऽवृन्दावनऽ, ऽगोपी गोपीऽ बले निरन्तर
 
 
अनुवाद
एक दिन ब्रह्माण्ड के स्वामी गोपियों के भाव में लीन हो गए और बोले, “वृन्दावन! गोपी! गोपी!”
 
One day the Lord of the Universe became absorbed in the feelings of the Gopis and said, “Vrindavan! Gopi! Gopi!”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)