श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 26: शुक्लाम्बर और विजय पर कृपा का वर्णन और भगवान की संन्यास की इच्छा  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  2.26.75 
কদাচিত্ কখন ও প্রভুর বাহ্য হয
ঽপ্রাণ যায মোরঽ সবে এই কথা কয
कदाचित् कखन ओ प्रभुर बाह्य हय
ऽप्राण याय मोरऽ सबे एइ कथा कय
 
 
अनुवाद
भगवान को कभी-कभार ही बाह्य चेतना प्राप्त होती थी, और जब ऐसा होता था, तो वे कहते थे, "मेरा प्राण जा रहा है।"
 
The Lord rarely attained external consciousness, and when this happened, He would say, "My life is leaving me."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)