श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 26: शुक्लाम्बर और विजय पर कृपा का वर्णन और भगवान की संन्यास की इच्छा  »  श्लोक 173
 
 
श्लोक  2.26.173 
মাথা মুডাইলে প্রভু, কিবা কর্ম হয
তোমার সে মত, এ বেদের মত নয
माथा मुडाइले प्रभु, किबा कर्म हय
तोमार से मत, ए वेदेर मत नय
 
 
अनुवाद
"हे प्रभु, क्या सिर मुँड़वाने का यही लाभ है? यह तो केवल आपका मत है, वेदों का मत नहीं है।"
 
"O Lord, is this the only benefit of shaving the head? This is only your opinion, not the opinion of the Vedas."
तात्पर्य
श्री गदाधर बोले, "यदि व्यक्ति गृहस्थ है, तो क्या वह विष्णु की भक्ति करने में असमर्थ है? क्या यह वेदों का आशय है? तो क्या कोई केवल अपनी शिखा और ब्राह्मण सूत्र का त्याग करके उन्नत हो सकता है जैसे कि निर्वैयक्तिकवादी हरि की भक्ति सेवा का दिखावा करने के लिए करते हैं? यदि व्यक्ति गृहस्थ बना रहता है और हरि की पूजा करता है, तो उसकी माँ प्रसन्न हो जाती है। उसके सभी मित्र और रिश्तेदार भी खुश हो जाते हैं।"

श्री गौरसुंदर ने अपने ईर्ष्यालु दोस्तों और साथियों का साथ छोड़कर यह सिखाने के लिए कि प्रतिकूल पारिवारिक जीवन को त्याग दिया जाना चाहिए। श्री गौरसुंदर का एक और उद्देश्य सभी को नाजायज़ घरेलू जीवन पर आधारित प्राकृत-सहजिया सिद्धांतों से मुक्त होना सिखाना था जो आजकल पूरे भारत में फैल गए हैं। हर इंसान का कर्तव्य है कि वह हमेशा हरि की पूजा करे चाहे वह किसी भी आश्रम में स्थित हो। यदि लोग गृहस्थ जीवन को अनुकूल मानकर स्मार्त सिद्धांतों के निर्देशन में पूर्वजों को भेंट चढ़ाने जैसी सांसारिक गतिविधियों में संलग्न होते हैं जो भक्ति सेवा के प्रतिकूल हैं, या यदि सर्वोच्च भगवान के विरोधी लोगों को जनता को संतुष्ट करने के लिए सम्मान दिया जाता है, तो भगवान के भक्तों सम्मान अज्ञानी लोगों की नज़रों में खो जाता है - यह प्रदर्शित करने के लिए, श्री गौरसुंदर ने उचित विनियमों के अनुसार संन्यास स्वीकार करने का पाश्चात्य किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)