श्री गौरसुंदर ने अपने ईर्ष्यालु दोस्तों और साथियों का साथ छोड़कर यह सिखाने के लिए कि प्रतिकूल पारिवारिक जीवन को त्याग दिया जाना चाहिए। श्री गौरसुंदर का एक और उद्देश्य सभी को नाजायज़ घरेलू जीवन पर आधारित प्राकृत-सहजिया सिद्धांतों से मुक्त होना सिखाना था जो आजकल पूरे भारत में फैल गए हैं। हर इंसान का कर्तव्य है कि वह हमेशा हरि की पूजा करे चाहे वह किसी भी आश्रम में स्थित हो। यदि लोग गृहस्थ जीवन को अनुकूल मानकर स्मार्त सिद्धांतों के निर्देशन में पूर्वजों को भेंट चढ़ाने जैसी सांसारिक गतिविधियों में संलग्न होते हैं जो भक्ति सेवा के प्रतिकूल हैं, या यदि सर्वोच्च भगवान के विरोधी लोगों को जनता को संतुष्ट करने के लिए सम्मान दिया जाता है, तो भगवान के भक्तों सम्मान अज्ञानी लोगों की नज़रों में खो जाता है - यह प्रदर्शित करने के लिए, श्री गौरसुंदर ने उचित विनियमों के अनुसार संन्यास स्वीकार करने का पाश्चात्य किया।
