श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 26: शुक्लाम्बर और विजय पर कृपा का वर्णन और भगवान की संन्यास की इच्छा  »  श्लोक 153
 
 
श्लोक  2.26.153 
ঽগৃহ ছাডিবেন প্রভুঽ জানিঽ নিত্যানন্দ
বাহ্য নাহি স্ফুরে, দেহ হৈল নিস্পন্দ
ऽगृह छाडिबेन प्रभुऽ जानिऽ नित्यानन्द
बाह्य नाहि स्फुरे, देह हैल निस्पन्द
 
 
अनुवाद
जैसे ही नित्यानंद को यह एहसास हुआ कि भगवान घर छोड़कर चले जाएंगे, उनकी बाह्य चेतना चली गई और उनका शरीर स्तब्ध हो गया।
 
As soon as Nityananda realized that the Lord would leave the house, his external consciousness vanished and his body became numb.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)