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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 26: शुक्लाम्बर और विजय पर कृपा का वर्णन और भगवान की संन्यास की इच्छा
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श्लोक 138
श्लोक
2.26.138
ইথে কিছু দুঃখ তুমি না ভাবিহ মনে
বিধি দেহঽ তুমি মোরে সন্ন্যাস-কারণে
इथे किछु दुःख तुमि ना भाविह मने
विधि देहऽ तुमि मोरे सन्न्यास-कारणे
अनुवाद
"इससे आप व्यथित न हों। मुझे संन्यास लेने की अनुमति दीजिए।"
"Don't let this bother you. Please allow me to retire."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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