जब श्री गौरसुंदर की इच्छा के अनुसार विश्व-वैष्णव-राज-सभा के विशेषज्ञ भक्त शुद्ध भक्ति सेवा के प्रचार में लगे, कालाना के अहंकारी कर्मियों के नेतृत्व में प्राकृत-सहजियाओं के एक समूह ने विभिन्न अवरोध उत्पन्न किए। वे प्राकृत-सहजिया, विष्णु की भक्ति सेवा के तथाकथित प्रचारक, शुद्ध भक्ति सेवा के प्रचार का विरोध करने के लिए पखवाड़े के एक समाचार पत्र जैसे विभिन्न माध्यमों में कठोर भाषा के प्रयोग का सहारा लेकर अपनी पूरी कोशिश करते थे। वे पापपूर्ण गतिविधियों, धार्मिक सिद्धांतों से विचलन, कृष्ण और उनके भक्तों से ईर्ष्या के रूप में अविश्वासी गतिविधियों और महिलाओं के साथ संसर्ग को श्री गौरसुंदर द्वारा प्रचारित शुद्ध भक्ति सेवा के मानकों के रूप में स्वीकार करके खुद को नष्ट करने के लिए भौतिक अस्तित्व के कुएँ में डूब गए। उनमें से कुछ ने वर्णाश्रम-धर्म का पालन करने के बहाने दैव-वर्णाश्रम प्रणाली का विरोध करने की कोशिश की, और कुछ ने भक्ति सेवा की प्रक्रिया को समझे बिना अपनी भोग की प्रवृत्ति को बनाए रखने के लिए अपनी दाढ़ी और मूंछें रखने की कोशिश की। मूर्ख प्राकृत-सहजिया भगवान के भक्तों के इरादों को नहीं समझ सकते। इसलिए वे गौरसुंदर के दिव्य व्यवहार और प्रयासों को कैसे समझेंगे? उन्होंने यह नया सिद्धांत बनाने में संकोच नहीं किया कि कृष्ण-प्रेम का वितरण भी - गौर के अत्यधिक शुद्ध मनोरंजन का अंतिम लक्ष्य - अनैतिक लोगों की विकृत मानसिकता है। प्रत्येक युग में हमें इस कथन का आशय मिलता है: कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेद-संज्ञिता - "समय के प्रभाव से, वैदिक ज्ञान की अलौकिक ध्वनि प्रलय के समय खो जाती है।" फिर भी, सर्वोच्च भगवान और उनके भक्त हमेशा धार्मिक सिद्धांतों में गिरावट को रोकने का प्रयास करते हैं। लेकिन पाप-चित्त वाले लोग अज्ञात रहस्यों को नहीं समझ पाते हैं।
