श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 26: शुक्लाम्बर और विजय पर कृपा का वर्णन और भगवान की संन्यास की इच्छा  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  2.26.121 
“করিল পিপ্পলিখণ্ড কফ নিবারিতে
উলটিযা আরো কফ বাডিল দেহেতে”
“करिल पिप्पलिखण्ड कफ निवारिते
उलटिया आरो कफ बाडिल देहेते”
 
 
अनुवाद
“मैंने अतिरिक्त बलगम को साफ करने के लिए पिप्पलीखंड औषधि बनाई, लेकिन शरीर में बलगम साफ होने के बजाय, इसने और अधिक बलगम बना दिया।”
 
“I made Pippalikhand medicine to clear excess mucus, but instead of clearing the mucus in the body, it created more mucus.”
तात्पर्य
"मैंने इस भूतल पर पीड़ित जीवधारियों को वह सत्य उपदेश करने का प्रयास किया जो अभी तक कभी भी प्रकट नहीं हुआ है। लेकिन इसे स्वीकार करने के बजाय, उन्होंने अपने कंधों पर अपमान का भारी बोझ उठा लिया। मैं नादिया के निवासियों के शाश्वत लाभ के लिए प्रचार करना चाहता था, लेकिन वे मेरे इरादे को नहीं समझे हैं और लगता है कि वे भ्रमित हो गए हैं, इसलिए वे शुद्ध भक्ति सेवा के प्रचार का विरोध कर रहे हैं। वैदिक साहित्य पिप्पलीखंड नामक औषधि निर्धारित करता है जो अत्यधिक कफ से पीड़ित व्यक्ति को ठीक करने के लिए है। लेकिन रोग को ठीक करने के बजाय, दवा ने केवल कफ को बढ़ा दिया है। इस दुनिया के भौतिकवादी लोग अपनी इंद्रिय तृप्ति को बढ़ाने के लिए काल्पनिक देवताओं की पूजा करते हैं। वे परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए कोई गतिविधि नहीं करते हैं, बल्कि केवल अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने में लगे रहते हैं। वे इंद्रिय तृप्ति को जीवन का लक्ष्य मानते हैं और कृष्ण की दुर्लभ प्राप्त की जाने वाली प्रेममयी भक्ति सेवा के बारे में नहीं पूछते हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)